गजल

1.

 

जेकरा में जड़ रहे उहे भीतर ले गड़ गइल

बाकी हवा के झोंक से अपने उखड़ गइल

 

शिकवा-गिला से फायदा कुछुओ त ना भइल

बाकी रहे जे ऊहो त रिस्ता बिगड़ गइल

 

लड़की के भाग आज से ऊ अजनबी बनी

सिन्दूर जेकरा नाम के माथा में पड़ गइल

 

अपना घरे में हार के बइठल उदास बा

ऊ जे कि बात-बात पर दुनिया से लड़ गइल

 

कइसन रहे फसाद ई ऊहे बता सकी

जेकर ए मार-काट में दुनिया उजड़ गइल

 

दिल हो गइल उघार त ‘भावुक’ के का कसूर

जब आज बाते बात में दरिया उमड़ गइल

 

2.

 

 

गाँजल बा घरे भक्त के तोसक आ रजाई

फुटपाथ प भगवान बा कठुआत ए भाई

 

कलुअन के घरे भूख से मर जात बा लइका

ललुअन के घरे रोज बा अरुआत मिठाई

 

नफरत के जे तूफान सहत बाटे हर एक रोज

एक रोज उहे दीप मुहब्बत के जराई

 

चहलीं त बहुत काठ से कुछ ना कहीं, बाकिर

झरिये नू गइल आँख से जज्बात ए भाई

 

मझधार से हम बांच के अइनी जे किनारे

देवास प भगवान से भखले होई माई

 

शुरुआत भइल बाटे अभी जंग के ‘भावुक’

हक ना मिली जब मांग के त छीन के खाई

 

3.

 

बन के पागल घुमत बानी हम रोड पर

काटे लागल बा हमरा के अब अपने घर

 

गाँव छोड़ले रहीं आस लेके बहुत

ठाँव कतहीं मिलत नइखे सउँसे शहर

 

आज ले ना ठहरनी, ना टिकनी कहीं

आज ले हम कहत बानी रस्ते के घर

 

बात बोलs कि मुर्दा समय जी उठे

गीत गावs कि काठो प होखे असर

 

हमरा अँखियन के भाषा समझ लेते ऊ

जो मुहब्बत के उनका में होइत नज़र

 

काश! ‘भावुक’ कबो हमके ऊहो सुने

जेकरा खातिर गज़ल कहनीं हम उम्र भर

 

मनोज भावुक

संपादक

भोजपुरी जंक्सन पत्रिका

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